सुविधा के अभाव में पिता ने गांव छोड़ दिया, 30 साल बाद IFS बेटे ने उसी गांव को गोद लिया


एक सरकारी अधिकारी से क्या अपेक्षा किया जा सकता है? यही न कि वे जनसेवक होते हैं, जनता के बीच जाकर भलाई का काम करते हैं. मगर ऐसा होता है क्या? वास्तविकता यही है कि लोगों को साधारण सा भी काम करवाने लिए कई दिनों तक इंतज़ार करना पड़ता है. हालांकि, सभी सरकारी अधिकारी ऐसे नहीं होते हैं. पश्चिम बंगाल काडर के IFS अधिकारी एक अपवाद हैं.

तामिलनाडु के सिरुवथुर के रहने वाले बालामुरुगन, 30 साल बाद जब अपने गांव घूमने आए, तो गांव की स्थिति देख दंग रह गए. 2,500 परिवारों की बस्ती में ना लाइट की सुविधा है और ना ही पीने का पानी उपलब्ध है. इसके अलावा मूलभूत सुविधाओं से भी यह गांव वंचित है.
Source: Facebook

ऐसी स्थिति देख, बालामुरुगन ने अपने गांव को ही गोद ले लिया. अब वे पूरे गांव को मुख्यधारा में लाएंगे.

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बच्चों की पढ़ाई के लिए बालामुरुगन सरकारी स्कूल को फ़िर से बनवा रहे हैं. इसके अलावा गांव में नशाखोरों और असामाजिक तत्वों के ख़िलाफ़ भी अभियान छेड़े हुए हैं.

अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए बालामुरुगन के पिता सालों पहले इस गांव से दूर जाकर बस गए थे. मगर बालामुरुगन अपनी मेहनत से गांव की समस्या को ही दूर करना चाहते हैं. वाकई में आज देश को ऐसे ही अधिकारियों की ज़रूरत है, जो ज़मीन से जुड़ कर लोगों के लिए काम करें.

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